वास्तुशास्त्र-आठ प्रमुख दिशाएं एवं महत्व

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वास्तुशास्त्र-आठ प्रमुख दिशाएं एवं महत्व

ब्रहांड की कोई दिशा या दशा नहीं है, वो तो अनंत है। परन्तु, पृथ्वीवासियों के लिए जीवन को संभव बनाने वाले सूर्य एवं पृथ्वी के चुम्बकीय क्षेत्र पर आधारित दिशाएं मानक की गयी है। वास्तुशास्त्र के अनुसार, मानव जीवन को प्रभावित करने वाली आठ दिशाये होती है। प्रत्येक दिशा, अपने ही तरह का एक विशेष महत्त्व रखती है। यदि आप इन दिशाओ से सम्बंधित वर्णित वास्तु सिद्धांतो का सही तरीके से अपने घर अथवा कार्यस्थल पर अनुपालन करते है, तो आपको सकारात्मक परिणाम निश्चित रूप से दिखाई देंगे। अपने आवास और कार्यस्थल का वास्तु विन्यास, इन दिशाओ के महत्त्व को समझते हुए करवाने से सुखद पारवारिक जीवन एवं व्यवसाय में उन्नति स्पष्ट दिखाई देगी।

प्रत्येक दिशा का प्रतिनिधित्व एक देवता करते है। इस लेख में, इन्ही आठो दिशाओ पर थोड़ा विस्तार में वर्णन आगे दिया गया है। आइये, आठो मूलभूत दिशाओं एवं उनके महत्व के साथ-साथ प्रत्येक दिशा के उत्तम प्रयोग को थोड़ा जाने। स्मरण रखे, वास्तु का वैज्ञानिक आधार है, अतः इस लेख में वर्णित दिशा-निर्देश पूर्णतः तर्क संगत है।


 

पूर्व दिशा

पूर्व दिशा का प्रतिनिधित्व सूर्य देवता करते है। पूर्व दिशा को शुभारंभ की दिशा के रूप में वास्तुशास्त्र में वर्णित किया गया है। अतः अपने भवन का मुख्य द्वार पूर्व दिशा में निर्मित करवाने का सुझाव दिया जाता है। इस सुझाव के पीछे दो तर्क है - धार्मिक तर्क के अनुसार, पूर्व दिशा के देवता सूर्य को सत्कार देना चाहिए, दूसरा वैज्ञानिक तर्क - पूर्व दिशा में मुख्य द्वार रखने के कारण, सूर्य का प्रकाश एवं शुद्ध वायु प्रवाह पूरे भवन में पर्याप्त मात्रा में बना रहेगा। सुबह के सूरज की पैरा बैंगनी किरणें रात्रि के समय उत्पन्न होने वाले सूक्ष्म जीवाणुओं को खत्म करके घर को ऊर्जावान बनाएं रखती है।

 

पश्चिम दिशा

पश्चिम दिशा का प्रतिनिधित्व जल देवता - वरुण करते है। वास्तुशास्त्र के अनुसार, पश्चिम दिशा को द्गायन के लिए उचित नहीं माना जाता। इसका वैज्ञानिक तर्क भी है।  शाम के सूरज की इंफ्रा रेड किरणों का सीधा प्रभाव पश्चिमी भाग पर पडता है, जिससे यह अधिक गरम हो जाता है। अतः इस भवन के इस हिस्से में, पेड -पौधे लगाए  अथवा इस दिशा में,स्टोर रूम, सीढियों, शौचालय अथवा बाथरूम का निर्माण करवाए।

 

उत्तर दिशा

धन के स्वामी कुबेर को उत्तर दिशा का प्रतिनिधि माना जाता है। इस ही दिशा में ध्रुव तारा भी है जो कि स्थायित्व एवं सुरक्षा का प्रतीक माना जाता है। अतः उत्तर दिशा कोई सभी आर्थिक कार्यो के लिए उत्तम समझा गया है। घर का लिविंग रूम (बैठक) को इस ही दिशा में निर्मित कराने का सुझाव दिया जाता है। इसके अतिरिक्त घर के उत्तरी भाग को खुला रखे जाने का भी सुझाव दिया जाता है। इसका वैज्ञानिक तर्क भी है - हमारा देश उत्तरी अक्षांश पर स्थित है, इसीलिए उत्तरी भाग अधिक प्रकाशमान रहता है। उत्तरी भाग खुला रखने से घर में प्रवेश करने वाला प्रकाश बाधित न हो।

 

दक्षिण दिशा

दक्षिण दिशा का प्रतिनिधित्व मृत्यु के देवता यमराज करते है। दक्षिण दिशा में अतिथि कक्ष या बच्चों के लिए शयन कक्ष बनाया जा सकता है। इस  दिशा में बॉलकनी या बगीचे जैसे खुले स्थान का निर्माण, भवन में नहीं करवाना चाहिए। भवन के दक्षिण भाग को खुला न छोड़ने से रात्रि में ये न अधिक गरम रहता है और न ही ज्यादा ठंडा। भवन का दक्षिण भाग शयन कक्ष के लिए उत्तम होता है।

 

उत्तर-पूर्व (ईशान कोण)

अन्य सभी दिशाओ से, इस दिशा को सबसे उत्तम माना जाता है। उत्तर एवं पूर्व दिशाओ के मध्य बनने वाले कोण को ईशान कोण कहा जाता है। इस दिशा में किसी भी प्रकार का कूड़ा संग्रह ना होने दे। इस दिशा में, भवन में शौचालय इत्यादि का निर्माण ना करे। ईशान कोण को खुला रखना चाहिए अथवा इस तरफ जल का स्रोत निर्मित करवाया जाना चाहिए। दो दिशाओ का समग्र प्रभाव ईशान कोण पर होता है। पूर्व दिशा के प्रभाव से ईशान कोण उगते सूर्य की रौशनी से प्रकाशमान होता है, तो उत्तर दिशा होने के कारण इस स्थान पर लंबी अवधि तक प्रकाश की किरणें रहती है। इधर बनाये गए जल स्रोत पर, उगते सूर्य कि पैरा-बैंगनी किरणें प्रभावी रूप से पड़ती है और जल को स्वच्छ करती है।

 

उत्तर- पश्चिम (वायव्य कोण)

उत्तर- पश्चिम दिशा के प्रतिनिधि वायु देवता है। वायव्य कोण भाग भी संध्या के समय सूर्य की तपती रोशनी से प्रभावित रहता है। वायव्य कोण वाली दिशा में, शौचालय, स्टोर रूम, स्नान घर आदि का निर्माण कराना उत्तम रहता है।  ऐसा करने से भवन के अन्य हिस्से, संध्या के सूर्य की ऊष्मा से बचे रहते है। वही ये ऊष्मा शौचालय एवं स्नानघर को सूखा रखने में सहायक होती है।

 

दक्षिण-पूर्व (आग्नेय कोण)

इस दिशा के प्रतिनिधित्व अग्नि देव करते है। अतः इस दिशा को ऊष्मा, जीवनशक्ति एवं ऊर्जा की दिशा माना जाता है। वास्तुशास्त्र के अनुसार, इस दिशा में रसोईघर का निर्माण कराना सर्वोत्तम रहता है। उगते सूरज की पैराबैंगनी किरणों का प्रभाव भी आपके रसोईघर को मक्खी-मच्छर जीवाणुओं से मुक्त रखने में सहायक होता है।

 

दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य कोण)

इस दिशा को नैऋुती अर्थात स्थिर लक्ष्मी (धन की देवी) की दिशा बताया गया है। दक्षिण-पश्चिम दिशा में तिजोरी या गृहस्वामी का शयन कक्ष निर्मित करवाया जाना चाहिए। वैज्ञानिक तर्क के अनुसार भी, इस दिशा में दक्षिण व पश्चिम दिशाओं का संगम, वेंटिलेशन के लिए बेहतर रहता है। अतः गृह स्वामी का शयन कक्ष इस दिशा में बनाने का सुझाव दिया गया है। कार्यस्थल पर भी तिजोरी या आलमारी को नैऋत्य कोण वाले हिस्से की पश्चिमी दीवार में स्थापित करना चाहिए ।

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